BHU Central Library ( Central Hall)
युँ तो बहुत समय बीता बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में, पर वहाँ बिताया गया वो पहला दिन सबसे यादगार रहा| वो सर्दियों का दिन था, प्रथम वर्ष का दूसरा सेमेस्टर नया नया प्रारंभ हुआ था, पढा़ई का बोझ भी कम था| सूर्य की किरणें मन को प्रफुल्लित कर रहीं थी और एक अजीब सी बेफिक्री मन पाँव पसार रही थी| यह सोच के बीएचयू में प्रवेश लिया था कि आगामी चार वर्षों में साहित्य का रसास्वादन तो करना है, लेकिन कैसे करना है इस बात पर आकर बात अक्सर ठिठक जाती थी| इसी बात को आकार देने उस दिन पहली बार कदमों ने रुख किया था केन्द्रीय ग्रन्थालय का|
एक बडा़ सा सेन्ट्रल हॉल, सुव्यवस्थित कुर्सी मेजें और वहाँ की फिजा़ओं में घुला एक रूहानीपन, किसी भी नए व्यक्ति को आकर्षित करने का और उसमें सकारात्मक ऊर्जा का नवप्रवाह करवाने का संपूर्ण सामर्थ्य रखता है|
मैं हिन्दी स्टैक सेक्शन गया , वहाँ किताबों का हुजूम था एक , काफी वक्त दुविधा में रहने के बाद अंतत: एक किताब चुनी- ‘नीड़ का निर्माण फिर’| यह श्री हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा के चार भागों में से तीसरा भाग था| दसवीं में नीड़ का निर्माण नामक एक कविता स्कूल में पढ़ी थी, जिसने उस वक्त मुझे बहुत प्रभावित किया था| इसी लिए इतनी सारी पुस्तकों में से इस किताब ने विशेष ध्यान आकर्षित किया|
दोपहर के 12:30 बज रहे थे| मैं पुस्तक लेकर बाहर हॉल में आ गया और पढ़ना प्रारंभ किया| लगभग ६-७ घंटों में एक लय में पूरी पुस्तक पढ़ डाली| इतना एकाग्रचित्त होकर शायद इससे पहले कोई पुस्तक नहीं पढ़ी थी| उस पुस्तक को उस वक्त पढ़ने का जो अहसास था, वैसा ही अब भी हो, इसकी उम्मीद कम है| उस दिन खुद को भूलकर कुछ घंटों के लिए हरिवंश राय बच्चन जी के जीवन सफर को जिया था मैंने| बेहतरीन हिंदी भाषा में लिखी गयी एक उत्कृष्ट पुस्तक थी ‘नीड़ का निर्माण फिर’| बच्चन जी की लेखनी में जादू था एक, हिप्नोटाइज़ कर लेते थे अपनी लेखन शैली से वह| ज्ञान, मनोविज्ञान, अप्रतिम शब्द संरचना और मार्मिक भावावेग का प्रफुल्ल संगम था उनका लेखन संसार|
रात के ८ बज रहे थे| एक सफल और जीवन पर्यन्त याद रहने वाला दिवस, अपने अन्त को आ रहा था| छात्रावास को लौटते हुए, कुछ पंक्तियाँ गूँज रही थी अंतस में, ‘नीड़ का निर्माण फिर फिर, सृष्टि का आह्वान फिर फिर…”
